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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 115, Verse 2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 115, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 115 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

एते हिमाद्रिमलयाचलविन्ध्यसह्यक्रौञ्चा महेन्द्रमधुमन्दरदर्दुराद्याः । दूरस्थिता दृशि सिताभ्रपटा वहन्ति संशुष्कपर्णलवलाञ्छितलोष्टलीलाम् ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज ! तलहटी, मध्यभाग तथा चोटी के क्रम से आगे पाषाणमयता को प्राप्त (अत्यन्त पथरीले) इस पर्वत की आकाश से बातें करनेवाली अतएव प्रचुरवायु से पूर्ण (अथवा क्रीड़ाविहार कर रहे गन्धर्वं आदि से भरी हुई) शिखर-भूमि को आप देखने की कृपा कीजिये