Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 9
29 verse-groups
- Verse 1आठवाँ सर्म समाप्त नौवाँ सर्ग तीन गुणों के विभाग, महादेव आदि की शुद्धसतत्वरूपता, विद्या एव…
- Verse 2महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, चूँकि निर्विकार शुद्धचित् का घी की नाई स्वतः घनीभाव…
- Verse 3श्रीरामजी, सृष्टि के आरम्भकाल में अपनी सत्ता से स्थित हुई जगत- संस्कार के उद्रोधस्वरूप कल…
- Verses 4–5जिस प्रकार मध्यान्ह प्रकाश, मन्द प्रकाश और छाया में सूर्य से विभिन्न तेज के अपकर्ष की कल्…
- Verse 6प्रश्नोत्तयो की अनुरूपता के लिए प्रकृति की अविद्यारूपता बतलाते हैं। हे श्रीरामजी, सत्त्व…
- Verse 7कार्य अविद्या ओर कारण अविद्या इन दोनों अविद्याओं मेँ अनुगत एक-एक गुण के अवान्तर तीन-तीन भ…
- Verse 8भद्र, इस प्रकार यह अविद्या गुणभेदों से नव प्रकार से विभक्त हो जाती है यानी सूक्ष्म, मध्य…
- Verse 9पहले विभाग में सत्त्तांश का उदाहरण देते हैं। भद्र, ऋषि, मुनि, सिद्ध (देवयोनिविशेष), नाग,…
- Verse 10उसके अवान्तर विभाग में तीन विभागों का भी दिग्दर्शन कराते हैं। श्रीरामभद्र, इस सात्विक विभ…
- Verse 11शिव आदि सत््वगुणान्तर्गत शुद्ध सत्त्वरूप हैं, इसमें युक्ति कहते है । सत्त्वजातिरूप देवयोन…
- Verse 12इसीलिए उनके उपासको को भी ज्ञानप्राप्ति के द्वारा पुनर्जन्म की निवृत्ति होती है, यह अत्यन्…
- Verse 13इसीलिए शिवादि तीन मूर्तियों में आवरण न होने के कारण जीवन्मुक्तता स्वाभाविक है, इस आशय से…
- Verse 14ये महात्मा देहस्थितिपर्यन्त जीवन्मुक्त होकर स्थित रहते हैं और देह का अन्त हो जाने पर विदे…
- Verse 15प्रश्न के समाधान का उपसंहार कर प्रस्तुत विषय की प्रस्तावना करते है। इस प्रकार विद्यारूपता…
- Verse 16कार्यअविद्या के उदय ओर प्रलय का आधार होने से भी विद्याशरीरी वे शिवादि अविद्यारूप ही हैं,…
- Verse 17इसलिए विद्या ओर अविद्या का भेद भी कल्पित ही है, यह सिद्ध हुआ, ऐसा कहते हैं। जैसे जल और तर…
- Verse 18विद्यादृष्टि से विद्या ओर अविद्या दोनों का बाध होने पर सुतरां उनके भेद की प्रसक्ति नहीं ह…
- Verse 19शंका हो कि विद्यादृष्टि से बाध्य होने के कारण अविद्या-द्ृष्टि का त्याग भले ही हो, परन्तु…
- Verse 20न अविद्या नाम का पदार्थ है और न विद्यानाम का ही पदार्थ है, इसलिए यह कल्पना व्यर्थ हे । (त…
- Verse 21श्रीरामजी, वही अवशिष्ट चित्-वस्तु जब अज्ञातस्वरूप रहती है, तब वह अविद्या कही जाती हे ओर…
- Verse 22छाया ओर धूप की नाई परस्पर विरुद्ध विद्या ओर अविद्या दोनों में से विद्या का अभाव होने पर अ…
- Verse 23श्रीरामभद्र, उन परस्पर विरुद्ध विद्या ओर अविद्या दोनों मे से अविद्या का बाध से चैतन्य में…
- Verse 24शंका हो कि बाघ न होने के कारण विद्या भी परिशिष्ट रूप से क्यो नहीं रहती 2 तो इस पर कहते है…
- Verse 25अतएव उसका दर्शन ही तत्त्वतः सर्वदर्शन और सर्वबाधदर्शन है, ऐसा कहते हैं। उक्त तात्त्वक रूप…
- Verse 26सर्वविध शक्तियों का आश्रय ही किंचित् वस्तुरूपत्व है, वही समस्त पराक्रमो की पिटारी है। वह…
- Verses 27–28जैसे सूर्यकान्तमणि में अग्नि है अथवा जैसे दूध में घी है, वैसे ही उस चिदात्मक शून्य में यह…
- Verse 29इसीलिए वह ब्रह्म समस्त जीवसंवित्तियों का कोश है, ऐसा कहते हैं। जैसे समुद्र तरंगों का और न…
- Verses 30–32निर्गमन की अवधि के कथन और मणिप्रभा के द्ृष्टान्त से जीव और जगत की ब्रह्म से अन्यत्र स्थित…
- Verse 33से जनित उत्तरोत्तर कल्पना से ही यह जगत उस प्रकार अवस्थित रहता है, जिस प्रकार चित्र-विचित्…