Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 9, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 9, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 9 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
आकारजातमुदितं शुद्धं हरिहराद्यपि ।
अविद्यैवेत्यहं श्रुत्वा ब्रह्मन्भ्रममिवागतः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
आठवाँ सर्म समाप्त
नौवाँ सर्ग
तीन गुणों के विभाग, महादेव आदि की शुद्धसतत्वरूपता, विद्या एवं
अविद्या के स्वरूप तथा उन दोनों से रहित वस्तु का वर्णन ।
पहले सर्ग के अन्तिम द्श्यं स्फुरन्ननु“ इत्यादि पद्य से जो महादेवजी आदि में अविद्यारूपता का
प्रतिपादन किया गया है, वह एकदम असम्भव है, क्योकि ऋतं सत्यं परं ब्रह्मण
श्ृतरीतिघनीभूतसच्चिदानन्दविग्रहः” इत्यादि श्रुति-स्मृतियों मे प्रह्मरूपता तथा
सच्चिदानन्दरूपता का उनके स्वरूपो में प्रतिपादन किया गया है । महादेवजी को अविद्यारूप मानने
में (ईशान: सर्वविद्यानाम् इत्यादि श्रुति प्रतिपादित सर्वविद्याधिपतित्व का भी विरोध होगा । वासुदेव
स्वरूप तुरीय तथा परब्रह्मरूप है, यह भी पुराणों में प्रसिद्ध है । ऐसी स्थिति में महादेवादि
की अविद्यारूपता नहीं हो सकती, यों शिवादि में अविद्यारूपता की असम्भावना कर रहे श्रीरामजी
प्रसंगतः उसके रहस्य को भी जानने की इच्छा से पूछते हैं।
श्रीरामजी ने कहा : हे ब्रह्मन्, आकृतिमात्र से आविर्भूत अत्यन्त शुद्धस्वरूप” शिव, विष्णु आदि भी
अविद्यास्वरूप ही हैं, इस प्रकार आपकी उक्ति का श्रवण कर मैं मिथ्या भ्रान्ति को प्राप्त हो गया हूँ,
कृपापूर्वक आप उसका निवारण कीजिए