Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 9, Verse 20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 9, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 9 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
विद्याविद्यादृशौ न स्तः शेषे बद्धपदो भव ।
नाविद्यास्ति न विद्यास्ति कृतं कल्पनयानया ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
न अविद्या नाम का पदार्थ है और न विद्यानाम का ही पदार्थ है, इसलिए यह कल्पना व्यर्थ हे । (तब
कोन वह अवशिष्ट वस्तु है उसको दिखलाते हुए बोध के पहले वही अविद्यारूप से कल्पित है, ऐसा
कहते हैं ।) वास्तव मेँ आत्मा से अतिरिक्त अवशिष्ट कुछ भी नहीं है, यदि कुछ है, तो वह एकमात्र
चित-वस्तु ही संवित रूप से अवस्थित है