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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 9, Verse 33

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 9, verse 33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 9 · श्लोक 33

संस्कृत श्लोक

तत्र स्थितं जगदिदं जगदेकबीजे चिन्नाम्नि संविदितकल्पितकल्पनेन । लोलोर्मिजालमिव वारिणि चित्ररूपं खादप्यरूपवति यत्र न किंचिदस्ति ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

से जनित उत्तरोत्तर कल्पना से ही यह जगत उस प्रकार अवस्थित रहता है, जिस प्रकार चित्र-विचित्र चंचल तरंगसमूह जल में स्थित रहता है, आकाश की अपेक्षा भी मूर्तअमूर्तरूपशून्य उस परब्रह्म के ज्ञात होनेपर कुछ भी भिन्न पदार्थ ज्ञातव्यरूप से बाकी नहीं रहता