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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 9, Verses 30–32

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 9, verses 30–32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 9 · श्लोक 30

संस्कृत श्लोक

कोशो नित्यमनन्तानां तथा तत्संविदां त्विषाम् । सबाह्याभ्यन्तरे सर्वं वस्तुन्यस्त्येव वस्तुसत् ॥ ३० ॥ सर्वदैवाविनाशात्म कुम्भानां गगनं यथा । यथा मणेरयःस्पन्दे अयस्कान्तस्य कर्तृता ॥ ३१ ॥ अकर्तुरेव हि तथा कर्तृता तस्य कथ्यते । मणिसंनिधिमात्रेण यथायः स्पन्दते जडम । तत्सत्तया तथैवायं देहश्चेतत्यचिद्वपुः ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

निर्गमन की अवधि के कथन और मणिप्रभा के द्ृष्टान्त से जीव और जगत की ब्रह्म से अन्यत्र स्थिति की प्रसक्ति का वारण करते हुए कहते हैं। घटो में आकाश की नाई समस्त वस्तुओं में बाहर और भीतर में सत्‌-स्वरूप अविनाशी (त्रिविध परिच्छेद से शून्य) चैतन्य वस्तु सदा सर्वदा विद्यमान रहती ही है। तात्पर्य यह है कि जैसे घट के उदर में व्याप्त आकाश का घट के आगमन और निर्गमन से आकाश में औपचारिक आवागमन होता है, वैसे ही जीव का भी आगमन निर्गमन औपचारिक ही है, वास्तविक नहीं