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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 9, Verse 18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 9, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 9 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

पयस्तरङ्गयोरैक्यं यथैव परमार्थतः । नाविद्यात्वं न विद्यात्वमिह किंचन विद्यते ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

विद्यादृष्टि से विद्या ओर अविद्या दोनों का बाध होने पर सुतरां उनके भेद की प्रसक्ति नहीं हो सकती, इस आशय से कहते है। परमार्थतः सदधिष्ठान में विद्या ओर अविद्या नाम की कोई वस्तु ही नहीं है, अतः विद्या और अविद्या-दृष्टि का यानी उनका भेद, विरोध आदि दृष्टि का परित्याग कर यहाँ जो कुछ अवशिष्ट रहता है, वही वास्तव में विद्यमान है, दूसरा नहीं