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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 9, Verse 25

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 9, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 9 · श्लोक 25

संस्कृत श्लोक

यच्छिष्टं तन्न किंचिद्वा किंचिद्वापीदमाततम् । तत्रैवं दृश्यते सर्वं न किंचन च दृश्यते ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

अतएव उसका दर्शन ही तत्त्वतः सर्वदर्शन और सर्वबाधदर्शन है, ऐसा कहते हैं। उक्त तात्त्वक रूप से वहाँ (परम चिति में) सब कुछ उस प्रकार दिखाई देता है, जिस प्रकार वटबीज में फल पुष्पादि से युक्त वटवृक्ष दिखाई पड़ता है और मायिकस्वरूप से कुछ भी नहीं दिखाई देता है; तात्पर्य यह है कि यद्यपि अज्ञानावृत दशा में वह अकिंचित्स्वरूपी है, तथापि वटबीज की नाई, व्याकृत ओर अव्याकृत दोनों अवस्थाओं में स्थूल-सूक्ष्मीभूत सर्वात्मकत्वरूप किंचित्स्वरूपता प्रसिद्ध है