Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 56
21 verse-groups
- Verses 1–6पचपनवाँ सर्गे समाप्त पूर्वापरग्रन्थ के प्रतिकूल भी है । छप्पनवाँ सर्ग भगवान द्वारा अर्जुन…
- Verse 7जीवन्मुक्त में दूसरा भी सुषुप्ति-साम्य है, यह कहते है । पार्थ, जैसे थोडा भी विक्षेप होने…
- Verses 8–9तब व्यवहार-काल में जीवन्मुक्त महात्मा लोग जगत् को किस रूप से देखते है 2 तो इस पर "मनोराज…
- Verse 10में ही यह जगत्रूप चित्र बनाया) तदनन्तर उसने उस चित्र की आधारस्वरूप दीवार की, जो अमूर्त आक…
- Verse 11और भी आश्चर्य दिखलाते हैं। (प्रसिद्ध चित्रस्थलों में चित्रों की आधारभूत दीवारें उन चित्रो…
- Verse 12"अहो भमः“ इसमें अहो“ इस अंश की विस्तृत व्याख्याकर अब भ्रमः“ इस अंश की विस्तारपूर्वक व्याख…
- Verse 13आत्मा, मन और उसका कार्य बाह्य ओर आभ्यन्तर यह सब जगत् स्वप्न की तरह शून्य है (असत् ही है…
- Verse 14तब तत्त्व क्या है ? यह कहते हैं। भ्रान्तिकल्पित पदार्थों में जिस सत्यसंकल्पता का तीनों का…
- Verses 15–18इस तरह इस मानसिक चित्र के भ्रान्तिमात्रस्वरूप हो जाने के कारण अपने भाई-बन्धघुओं के वध की…
- Verse 19अब तत्त्वतः अपरिचित चैतन्यात्मा चित्रकार है ओर उसके चित्र का आधार चित्तरूप दीवार है इस प्…
- Verse 20उसमें भी मनोराज्य का क्षणिक जगत् ही दृष्टान्त है, यह कहते है । हे अर्जुन, जैसे चित्त में…
- Verse 21पार्थं अनेक तरह के विषयानुभववाले मनोराज्य में क्षणिक मोह से परिकल्पित वध्यघातकभावादिरूप त…
- Verses 22–23शंका हो कि क्षणिक मोह अनादि एवं अनन्तर कल्पों में विस्तीर्ण संसाररुप मनोराज्य कैसे रचेगा…
- Verse 24उसे ही कहते हैं। क्षणभर के लिए ही अज्ञानवश जो यह चित्र-विचित्रस्वरूप प्रतीत हुआ मनोराज्य…
- Verse 25पार्थ, यद्यपि ज्ञानियों की दृष्टि में स्वतः नित्यमुक्त आत्मा में अध्यस्त, अतएव एकमात्र कल…
- Verse 26परन्तु वह ठीक नहीं है, यह कहते है। चूँकि यह जगत् अज्ञाततत्त्व आत्मा का एकमात्र अन्यथा प्…
- Verse 27जो वस्तु स्थित रहती है, उसीके निरास में प्रयत्न की अपेक्षा होती है, यह जगत् तो कभी स्थित…
- Verse 28अहो, अत्यन्त आश्चर्य हे कि यह उज्जवल चित्र दीवार के बिना ही उत्पन्न होकर सामने दिखाई दे र…
- Verses 29–30यह नाना प्रकार के तमरूपी स्याही से लिखा गया है और नाना प्रकार के तेज:किरणों से सुहावना हे…
- Verses 31–32वहाँ पर चित्रपद्मवन आदि का वर्णन करते है । इसमें आकाशरूप नील सरोवर मे खिले हुए तारे, चन्द…
- Verses 33–37अव त्रिलोकी का ही देवनटी रूप से वर्णन करते है। पार्थ, कामुक चित्तरूप इस चितेरे ने अधिष्ठा…