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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 56, Verses 33–37

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 56, verses 33–37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 56 · श्लोक 33-37

संस्कृत श्लोक

आकाश एव रचिता प्रतिभैकरङ्गा मुग्धा जगत्त्रयमनोहरपुत्रिकेयम् । चिन्मात्रचक्रपरिरञ्जितसर्वलोका लीलाकुला चपलचित्तकचित्रकर्त्रा ॥ ३३ ॥ हेमाचलाङ्गलतिका घनकेशपाशा चन्द्रार्कलोचनविचालनदृष्टलोका । धर्मार्थकामविनियन्त्रितशास्त्रवस्त्रा पातालजालचरणोन्नतभूनितम्बा ॥ ३४ ॥ ब्रह्मेन्द्ररुद्रहरिबाहुचतुष्टयोग्रा सत्त्वावृतोन्नतकुचस्फुरदङ्गयष्टिः । सुव्यालवेष्टितमहीतलपद्मपीठा पत्रीकृताचलमहाभुवनोदरी च ॥ ३५ ॥ रात्र्यन्धकारचपलत्वहराक्षिचेष्टा ताराकरालपुलका पविदन्तपङ्क्तिः । चञ्चच्चतुर्दशविधातुलभूतजातरोमाञ्चना प्रलयवादकदम्बपुष्पा ॥ ३६ ॥ जीवान्विता गगन एव कृता विचित्रा व्योमात्मिका चिरविलक्षणचित्रकर्त्रा । चित्तेन चित्रपरिकर्मविदा त्रिलोकी नानाविलासवलिता वरपुत्रिकेति ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

अव त्रिलोकी का ही देवनटी रूप से वर्णन करते है। पार्थ, कामुक चित्तरूप इस चितेरे ने अधिष्ठानभूत ब्रह्माकाश में ही इस जगद्रूप मुग्ध मनोहर नटी का निर्माण किया है । इस नटी की मुख्य नृत्यशाला प्रतिभा (नवनवोन्मेषशालिनी बुद्धि) ही हे, नृत्यशाला में दीपक का कार्य कर रहे साक्षिचेतन्य के प्रतिबिम्ब से युक्त और चक्र की नाई परिभ्रमणशील बुद्धिवृत्तिरूप आभूषणों से इसने समस्त लोकों को प्रकाशित किया है और यह नृत्य, हाव, भाव, विलास आदि लीलाओं में सदा व्यस्त रहती है । सुवर्णमय ब्रह्माण्ड ही इस नटी की दृढ़ अंगलतिका (शरीरलता) हे, मेघ ही इसके (नटी के) केशपाश हे, तथा चन्द्र ओर सूर्य रूपी नेत्रो के संचालन से यह सम्पूर्णं लोकों का अवलोकन भी किया करती हे । धर्म, अर्थ और काम के अनुकूल प्रवृत्तिनिवृत्तिशास्त्र ही इसके दो वस्त्र हैं, इसके पातालस्वरूप ऊरु,जानु, जंघा, गुल्फ, पाद, पार्ष्णी, ओर अंगुलि इन सात अवयवोंवाले दो चरण हैं ओर उन्नत पृथिवी ही इसका नितम्ब हे । ब्रह्मा, इन्द्र, शंकर ओर विष्णु - इसकी चार भुजाएँ हैं और उनसे यह समर्थ है । सत्त्वगुणरूप कंचुकी से ढके हुए, उन्नत विवेक ओर वैराग्य स्वरूप दो कुचो से इसकी देह शोभती है, शेष आदि से वेष्टित पृथिवी तल ही इसकी पद्याकार पीठ है तथा गोरोचन, कस्तुरी आदि नानाविध वर्णो से पत्र रचना के स्थानरूप बनाये गये मेरु, अंजन, हिमालय आदि नानावर्णवाले पर्वतो से युक्त महाभुवन (मध्यलोक) ही इस नटी का उदर है । इस त्रिलोकी नटी की चन्द्र-सूर्यरूप आँखों की चेष्टाएँ रात्रि के अन्धकार की चपलता को दूर करती हैं, जो कि मेरु प्रदक्षिणा करणरूप हे । तारे ही इसके घने पुलक हैं, बिजली ही इसकी दन्तपंक्ति है, चंचल और परस्पर असमान, भुवन-भेद से चौदह प्रकार के प्राणी ही इसके रोमांच हैं और उन प्राणियों में प्रसिद्ध भूत, भुवन, आदि की प्रलय-कथाएँ ही चारों ओर सद्बुद्धिरूप केसरो को और श्रोताओं के लिए वैराग्य, सद्वासनारूप सुगन्धि को प्रसारित करने के कारण मानों इसकी पैर तक लटकनेवाली कदम्ब-माला के फूल हें । यह समष्टि ओर व्यष्टिरूप जीव से समन्वित है, अद्भुत है, आकाश के समान शून्यरूप है और नाना प्रकार के विलासो से वेष्टित भी हे । उपर्युक्त प्रकार से वर्णित त्रिलोकीरूप इस श्रेष्ठ चित्रमयी नटी का-चित्र के उपकरणभूत विचित्र वासना, काम एवं कर्मो को प्राप्त किये हुए, अतएव शीघ्र ही अद्भुत चित्रों का निर्माण करने में समर्थ चित्तरूप चित्रकारने अपने अधिष्ठानरूप चिदाकाश में ही-चित्रण किया हे