Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 56, Verse 10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 56, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 56 · श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

पश्चाद्भित्तिः कृता व्योमरूपा चासावहो भ्रमः । अपूर्वैवातिमायेयं तृणकुड्यमयी शुभा ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

में ही यह जगत्रूप चित्र बनाया) तदनन्तर उसने उस चित्र की आधारस्वरूप दीवार की, जो अमूर्त आकाशरूप होने के कारण चित्रधारण करने में सर्वथा अयोग्य ही है, रचना की यह महान्‌ आश्चर्य है इसीलिए यह भ्रम ही है। “अहो भ्रमः“ इन दोनों पदों का विस्तृत व्याख्यान करते हैं। यह रचना अपूर्ण और माया का भी तिरस्कार करनेवाली है, तृणदीवार के सदृश साररहित होने पर भी यह भ्रान्तिदृष्टि से शुभरूप प्रतीत होती हे