Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 56, Verse 12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 56, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 56 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
व्योम्नः शून्यतमा विद्धि तास्तामरसलोचन ।
क्षणेन चेतसि यथा भ्रान्तौ लोकक्षयोदयौ ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
"अहो भमः“ इसमें अहो“ इस अंश की विस्तृत व्याख्याकर अब भ्रमः“ इस अंश की विस्तारपूर्वक
व्याख्या करते हैं।
हे कमलनयन, वे मानसिक चित्र-रचनाएँ आकाश से भी बढ़कर वैसे ही शून्यरूप हैं अर्थात् अत्यन्त
असत् हे, जैसे स्वप्न में क्षणमात्र में चित्त मेँ होनेवाले तीनों लोकों के नाश ओर उदय, यह तुम
जानो