Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 56, Verse 28
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 56, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 56 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
अकुड्यमप्यरङ्गाढ्यमिदं स्फारमिवाग्रतः ।
अहो नु चित्रं निर्भित्ति चित्रमुज्ज्वलमुत्थितम् ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
अहो, अत्यन्त
आश्चर्य हे कि यह उज्जवल चित्र दीवार के बिना ही उत्पन्न होकर सामने दिखाई दे रहा हे !
सामने किस प्रकार का है ? इस पर कहते हैं।
यह जगद्रूप चित्र भलीर्भोति लोगों का अनुरंजन करनेवाला हे, और दृष्टि, मन आदि को भी
लुभानेवाला है