Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 56, Verse 14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 56, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 56 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
किं त्वनालोकितेऽपि स्यात्सत्यं नास्त्येव विभ्रमे ।
क्रमेणालोकतः सत्यमालोकेन विलीयते ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
तब तत्त्व क्या है ? यह कहते हैं।
भ्रान्तिकल्पित पदार्थों में जिस सत्यसंकल्पता का तीनों काल में अभाव है, वह तत्वतः क्या
अदृष्ट-दशा में (तत्त्वज्ञान से पहले) कभी रह सकती है अर्थात् कभी नहीं । जो वसन्तादि कालक्रम
से, बाल्यादि अवस्थाक्रम से अथवा छः प्रकार के भावविकारक्रम से देखने पर अर्थक्रियासामर्थ्यरूप
या और कोई दूसरा प्रसिद्ध व्यावहारिक सत्यत्व उनमें भासता है, वह तत्त्वज्ञानरूप प्रकाश से उस
प्रकार नष्ट हो जाता है, जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश से दिखाई दे रहा शरत्काल का मेघमण्डल
उसीसे खाया जाता हुआ नष्ट हो जाता है