Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 56, Verses 8–9
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 56, verses 8–9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 56 · श्लोक 8,9
संस्कृत श्लोक
विश्वात्मनि तथा विश्वं कालत्रयमयोदितम् ।
अभित्ति त्रिजगच्चित्रं कुरुते चित्तचित्रकृत् ॥ ८ ॥
व्योम्नि व्योमात्मकमपि प्रस्फुटं वृत्तिवर्तिभिः ।
चित्तचित्रकरेणादौ चित्रं चित्रं वितानितम् ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
तब व्यवहार-काल में जीवन्मुक्त महात्मा लोग जगत् को किस रूप से देखते है 2 तो इस पर
"मनोराज्य में परिकल्पित दीवार से रहित विचित्र चित्र की नाईं ही देखते हैँ" यह बतलाने के निमित्त
सृष्टि से लेकर प्रलयपर्यन्त सम्पूर्ण जगत् का मनोरवित चित्र के रूप में वर्णन करने के लिए भूमिका
बाँधते हैं।
चित्तरूपी चित्रकार विश्व के अधिष्ठानभूत आत्मा के ऊपर अनन्त उन-उन वैचित्र्यों से युक्त
तीनोंकाल में उदित स्वभाव सम्पूर्ण त्रिजगत्रूपी चित्र का दीवार के बिना निर्माण कर देता है। स्वयं
एकमात्र अज्ञानस्वरूप होने के कारण प्रकाशन के अयोग्य भी, चिदाभासयुक्त अन्तःकरणवृत्तिरूप
बत्तियों द्वारा प्रकाशित हुए इस अद्भुत त्रिजगत्रूपी चित्र को अज्ञानरूपी आकाश में पहले-पहल
चित्तरूप चितेरे ने ही इतने विशालरूप में परिणत किया है