Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 56, Verse 25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 56, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 56 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
यद्विचित्रात्म तदिदं जगज्जालमिति स्थितम् ।
सर्गे निर्वाणनिष्ठत्वान्निमेषमयमुत्थितम् ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
पार्थ, यद्यपि ज्ञानियों की दृष्टि में स्वतः नित्यमुक्त आत्मा
में अध्यस्त, अतएव एकमात्र कल्पना से उत्पन्न होने के कारण प्रतीतिकाल मात्रस्थायी यह तुच्छ जगत्
क्षणिक ही है, तथापि इसी क्षणिक जगत् में इसके वास्तविक स्वरूप से अपरिचित अज्ञानी लोगों ने
दुरुच्छेदता की कल्पना कर रक्खी हे