Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 56, Verse 7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 56, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 56 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
स्थिरां संस्थितिमायान्ति कूर्माङ्गानीव सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यो हृदि यस्य स्वभावतः ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
जीवन्मुक्त में दूसरा भी सुषुप्ति-साम्य है, यह कहते है ।
पार्थ, जैसे थोडा भी विक्षेप होने पर कछुवे के सिर, पैर आदि अंग तत्काल ही भीतर प्रविष्ट हो
जाते हैं, वैसे ही तत्त्वज्ञान से बाधित हो जाने के कारण तुच्छभूत विषयों से अनायास निवृत्त हुई जिसकी
इन्द्र्यो मन के साथ परमात्मा के अन्दर निश्चल स्थिति (एकरसता से स्थिरता) प्राप्त करती हैं, वही
जीवन्मुक्त हे