Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 56, Verses 29–30
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 56, verses 29–30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 56 · श्लोक 29,30
संस्कृत श्लोक
सुरञ्जनं जगदिति स्फुटं दृष्टिविलोभनम् ।
नानातमोमषीलेखं नानातेजोंशुरञ्जनम् ॥ २९ ॥
नानाकल्पाङ्गावयवं नानारागानुरञ्जितम् ।
नानादृष्टिविलासाढ्यं नानानुभवलोचनम् ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
यह नाना प्रकार के तमरूपी स्याही से लिखा गया है और नाना प्रकार के तेज:किरणों
से सुहावना हे । यह नाना कल्प और उनके अंगभूत युग आदिरूप अवयवा से युक्त है तथा नाना प्रकार
की अभिलाषाओं से रंगा गया है । यह नाना प्रकार के दृश्यों के विलासो से परिपूर्ण हे, अनेक अनुभवरूप
नेत्रो से समन्वित है तथा अनेक प्रकार के ग्रहों से अत्यन्त चमक रहा हे । सूर्योदय और सूर्यास्त आदि
कालों मे इसकी पूर्व ओर पश्चिम दिशाएँ नाना आकारो से युक्त होती हैं