Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 56, Verses 15–18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 56, verses 15–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 56 · श्लोक 15-18
संस्कृत श्लोक
दृश्यमानमपि क्षामं शरदीवाभ्रमण्डलम् ।
चित्तचित्रकृतश्चित्रे संस्थिताश्चित्रपुत्रिकाः ॥ १५ ॥
भित्त्यभावादनाकारा बहिस्त्रिभुवनादिकाः ।
न ताः सन्ति न वासि त्वं किं केन परिरोध्यते ॥ १६ ॥
रोध्यरोधकसंमोहं त्यक्त्वा खे विमलो भव ।
प्रवृत्तिरेव न व्योम्नः प्रवृत्तिश्चैव खात्मिका ॥ १७ ॥
अतः कालक्रियाकुड्यकलादिविमलं नभः ।
चित्तसंस्थं यथा चित्रं सरूपमखिलात्मकम् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
इस तरह इस मानसिक चित्र के भ्रान्तिमात्रस्वरूप हो जाने के कारण अपने भाई-बन्धघुओं के वध
की आशंका से उत्पन्न क्लेश से तुम्हें व्यग्र बनना उचित नहीं है, यह कहते हैं।
चित्तरूपी चितेरे के चित्र में अवस्थित त्रिभुवन आदि विचित्र पुतलियाँ आधारभूत दीवार के न रहने
से बाहर आकाररहित ही हैं। हे अर्जुन, वास्तव में न तो उनका अस्तित्व है और न तुम्हारा ही अस्तित्व
है, इसलिए कौन किससे मारा जाता है ? अतः नाश्य-नाशक का मोह छोड़कर तुम निर्मल बनकर
ब्रह्मपद में स्थिर हो जाओ। क्योकि चिदाकाश में वधादि की प्रवृत्ति ही नहीं है। और जो कहीं प्रातिभासिकी
प्रवृत्ति है, वह भी ब्रह्माकाश रूप ही है, इसलिए काल, क्रिया, जगद्रूप दीवार ओर उस पर चित्र बनाने
की कला आदि सब कुछ निर्मल ब्रह्म ही है । हे अर्जुन, जैसे एकमात्र चित्त में रहनेवाला मनोराज्यरूप
चित्र समस्त प्रपंचस्वरूप होता हुआ भी वास्तव में शून्यस्वरूप होने से असत् ही है, वैसे ही सामने
दिखाई दे रहा यह जगत् भी आकाश से भी बढ़कर शून्यरूप है यह तुम जानो