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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 56, Verses 1–6

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 56, verses 1–6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 56 · श्लोक 1-6

संस्कृत श्लोक

श्रीभगवानुवाच । इति निर्वासनत्वेन जीवन्मुक्ततयार्जुन । अन्तः शीतलतामेत्य बन्धुदुःखमलं त्यज ॥ १ ॥ जरामरणनिःशङ्क आकाशविशदाशयः । त्यक्तेष्टानिष्टसंकल्पो वीतरागो भवानघ ॥ २ ॥ प्रवाहपतितं कार्यमिदं किंचिद्यथागतम् । कुरु कार्याणि कर्माणि न किंचिदिह नश्यति ॥ ३ ॥ प्रवाहपतितं कर्म स्वमेव क्रियते तु यत् । जीवन्मुक्तस्वभावोऽयं सा जीवन्मुक्तता तथा ॥ ४ ॥ इदं कर्म त्यजामीदमाश्रयामीति निर्णयः । मूढस्य मनसो रूपं ज्ञानिनस्तु समा स्थितिः ॥ ५ ॥ प्रवाहपतितं कर्म कुर्वन्तः शान्तचेतसः । जीवन्मुक्ताः सुषुप्तस्थाः स्फुरन्त्यत्र सुषुप्तवत् ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

पचपनवाँ सर्गे समाप्त पूर्वापरग्रन्थ के प्रतिकूल भी है । छप्पनवाँ सर्ग भगवान द्वारा अर्जुन को जीवन्मुक्तप्रतिष्ठा, चिति की अबाधित सत्ता ओर मन के जगत्स्वरूप चित्र का सविस्तार उपदेश | भगवान श्रीकृष्ण ने कहा : हे अर्जुन, इस प्रकार वासनानिवृत्तिरूप जीवन्मुक्तत्वस्वरूप से तुम भीतर शीतलता (शान्ति) प्राप्तकर बन्धुवधप्रयुक्त दुःख का निःशेषरूप से परित्याग कर दो । हे पापशून्य अर्जुन, जरा ओर मरण की शंका से निर्मुक्त, आकाश की नाई विशाल चित्तवाले तथा इष्ट एवं अनिष्ट विषयों को संकल्पो से रहित होकर तुम वीतराग हो जाओ । हे अर्जुन, शिष्ट व्यवहार- परम्परा से चला आ रहा, अवश्यकर्तव्यरूप भाग्यवश प्राप्त यह युद्ध-कर्म ओर अन्यान्य दूसरे आवश्यक याग, दान आदि कर्म तुम करो | उससे तत्त्वज्ञान की कुछ भी क्षति नहीं होगी, यह भाव है । शिष्ट व्यवहार-परम्परा से चला आ रहा स्वधर्मरूप कर्म जो किया जाता है, वह तो जीवन्मुक्तो का स्वभाव ही है ओर वही जीवन्मुक्तता है, केवल देह-चेष्टा का परित्याग करना जीवन्मुक्तता नहीं है। “यह कर्म मैं छोडता हूँ” ओर “इस कर्म का मैं अंगीकर करता हूँ” इस प्रकार का जो निर्णय है, वह तो एकमात्र अज्ञानियों के मन का स्वरूप है ओर ज्ञानियों की तो एक-सी स्थिति रहती हे । प्रवाहपतित कर्म कर रहे, शान्तमना तथा सुषुप्त की नाई अपनी आत्मा में स्थित हो रहे जीवन्मुक्त महात्मा लोग इस व्यवहार-भूमि मेँ संकल्प-विकल्पों से शून्य होकर सुषुप्तात्मा के सदृश निर्विशेष स्वयंज्योति एकमात्र आत्मरूप होकर स्फुरित होते हैं