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Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 43

बयालीसवाँ सर्ग समाप्त तैंतालीसवाँ सर्ग वैराग्य से पूर्ण स्वात्मस्वरूप शिवजी का पूजन सुनकर श्रीरामचन्द्रजी प्रबुद्ध हो गये ओर स्वयं कृतकृत्य होकर शिवार्चन में तत्पर हो गये यह वर्णन ।

33 verse-groups

  1. Verse 1तत्त्वसाक्षात्कार में पर्यवसित, इश्वर द्वारा उपदिष्ट, स्वात्मरूप शिवजी के पूजन की श्रीराम…
  2. Verse 2भद्र, जिस असद्रूप मायारूप भ्रम में असद्रूप उपाधि से घटित होने के कारण असद्रूप जीव असत्‌ ह…
  3. Verse 3भावों की कल्पनारूप काव्य-रचना से जिस-जिस तरह कथन किया जाता है उस-उस तरह श्रवण कर वे राजा…
  4. Verse 4विविधकल्पना अज्ञात आत्मा का स्वभाव ही है, इस आशय से और भी दूसरे दृष्टान्त बतलाते हैं। जैस…
  5. Verse 5इस प्रकार स्वाभाविक ही विकल्परूप अध्यारोप में पूजनरूपता का चिन्तन मैं तभी से लेकर आज तक क…
  6. Verse 6हे श्रीरामचन्द्रजी, इस पूजन-विधान से इन व्यवहारपूर्ण दिनों को भी मैं अखिनन होकर विता रहा…
  7. Verse 7। जाग्रत्‌-कालमें दिन -रात समयानुसार प्राप्त हुए क्रियाचाररूप कुसुमों से आत्मा का पूजन कर…
  8. Verse 8तब तो अज्ञानियों को भी उक्त प्रकार का शिवार्चन सदा ही हो जाया करता है ? इस पर कहते हैं। आ…
  9. Verse 9वह सावधानता विषयासंग का त्याग करने पर ही प्राप्त होती है, यह बतला रहे महाराज वसिष्ठजी उक्…
  10. Verse 10छोड़ी गई आसक्ति पुनः उत्पन्न न होने में विचार की दढता ही हेतु है, यह कहते हैँ । हे सुव्रत…
  11. Verse 11भद्र, धन और बन्धुओं का आगम ओर अपाय होने पर हर्ष और विषाद नहीं करना चाहिए, क्योकि ये सभी स…
  12. Verse 12श्रीरामभद्र, वे व्यग्रता उत्पन्न करनेवाली विषयों की चित्र-विचित्र परिस्थितियाँ पहले जिस त…
  13. Verse 13इसी प्रकार अविचारित हेतुओं से प्रेम ओर धन आते रहते हैं ओर यों ही चले भी जाते हैं
  14. Verse 14हे निर्मल, वे जगत्‌ के व्यवहार न तो आपके अन्दर हैं और न आप ही उनके अन्दर हैँ । इस प्रकार…
  15. Verse 15यदि आप जगत्‌ की तुच्छता नहीं चाहते, तो (आत्मा ही जगत्‌ है” यह भावना कीजिए । वैसा करने से…
  16. Verse 16हे तात, आप चिन्मात्रस्वरूप हैं, यह जगत्‌ आपसे पृथक्‌ नहीं है इसलिए आपको किस प्रकार और कहा…
  17. Verse 17उक्त रीति से चिन्मय जगत्‌- सागर में चिद्रूप जगदात्मक चक्र की चंचलता होने पर और समुद्र में…
  18. Verse 18उक्त पूजन की अन्तिम सीमा में श्रीरामचन्द्रजी को स्थिर करते हैं। हे श्रीरामजी, पहले एकमात्…
  19. Verse 19स्वयं सर्वविध वैषम्यों से निर्मुक्त, ब्रह्म के साथ एकरस स्वरूपतापन्न जगद्रूप आभासो से युक…
  20. Verse 20हे रघुनन्दन, यह सब आपने सुना ओर परिपूर्ण बुद्धि होकर आप स्थित भी हैं । जो कोई दूसरा प्रश्…
  21. Verse 21श्रीरामजी ने कहा : ब्रह्मन्‌, आज मेरा संशय विशेषरूप से निवृत्त हो गया । मेने समस्त ज्ञातव…
  22. Verse 22हे मुने, अब मुझमें न अज्ञान है, न जीव और ब्रह्म का भेद है, न चेत्य है ओर न मन ही हे । पहल…
  23. Verse 23हे मुने, उक्त अज्ञानवश "आत्मा में कलंक हे" इस प्रकार की जो भ्रान्ति थी, वह आपके प्रसाद से…
  24. Verse 24न तो आत्मा उत्पन्न होता है, न मरता है ओर न कलंकयुक्त ही रहता हे । “यह सब जगत्‌ ब्रह्ममय ह…
  25. Verses 25–26भगवन्‌, सब प्रकार के प्रश्नों से, संशयो से ओर इच्छित पदार्थो से यानी सभी ओर से निवृत्त हु…
  26. Verse 27महाराज, जिस प्रकार सुमेरुपर्वत सुवर्णो की अभिलाषा न करता हुआ स्थित रहता है, उसी प्रकार सा…
  27. Verse 28हे मुने, यह हेय है, यह उपादेय है, यह सत्‌ है ओर यह असत्‌ भी है, इस प्रकार का महान्‌ चिन्त…
  28. Verses 29–30मैं न स्वर्ग की अभिलाषा करता हूँ और न रोरव नरक के साथ द्वेष ही करता हूँ, किंतु मन्दराचल क…
  29. Verses 31–32परमाणु की नाई कण-कण बनाकर तीनों लोकँ को नष्ट कर देनेवाले क्षीर-सागर की चारों ओर जो व्याप्…
  30. Verse 33हे भगवन्‌, आपके प्रसाद से हम इस भाव-सागर से, जो कि चित्र-विचित्र भूख, प्यास आदि से जनित व…
  31. Verse 34हे परमेश्वर, हमने सम्पत्तियं की अवधि जान ली, आपत्तियों की सीमा का भी अन्त देख लिया । हमें…
  32. Verse 35महर्षे, अब हमारा मन इस संसाररूप समरक्षेत्र में आशारूपी हाथियों का विदलन कर शत्रुओं से अभे…
  33. Verse 36परिपूर्ण मन:स्थिति का ही वर्णन कर रहे श्रीरामजी उपसंहार करते हैँ । भगवन्‌, मेरे मन से समस…