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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 43, Verse 4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 43, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

यथा द्रवत्वं पयसि यथा स्पन्दो नभस्वति । यथा नभसि शून्यत्वं तथा सर्गत्वमात्मनि ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

विविधकल्पना अज्ञात आत्मा का स्वभाव ही है, इस आशय से और भी दूसरे दृष्टान्त बतलाते हैं। जैसे जल में द्रवत्व स्वभाव है, जैसे वायु में स्पन्दनत्व स्वभाव है और जैसे आकाश में शून्यत्व स्वभाव है, वैसे ही आत्मा में सर्गत्वस्वभाव हे