Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 43, Verse 33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 43, verse 33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
स यत्र याति कार्पण्यं जगतस्तन्न लभ्यते ।
विचित्राकुलकल्लोलाज्जडाद्वृत्तिविवर्जितात् ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे भगवन्, आपके प्रसाद से हम इस भाव-सागर से, जो कि चित्र-विचित्र भूख,
प्यास आदि से जनित व्याकुलताओं से परिपूर्ण (काम आदि रूप छः) तरगों से युक्त तथा विशुद्ध
चिदाकारवृत्ति से शून्य होने के कारण जडरूप है, पार पा गये