Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 43, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 43, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
यथा येन विकल्पेन यद्विकल्पेन कथ्यते ।
तथा तेनात्मकल्पेन नगताऽप्यनुभूयते ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
भावों की कल्पनारूप काव्य-रचना से जिस-जिस तरह कथन किया जाता है उस-उस तरह श्रवण
कर वे राजा आदि अपने अन्दर मेरु-रूपता का या कल्पवृक्षता का भी अनुभव करते हैं । यदि उन्हें यह
अनुभव नहीं होता तो काव्यार्थानुभव चमत्कार का आस्वाद नहीं होता ओर कवियों को अधिक द्रव्य
लाभ, मान आदि भी नहीं होते, यह भाव है