Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 43, Verses 29–30
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 43, verses 29–30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
इति चिन्ताभ्रमः शान्तो निपुणं परमो मुने ।
न स्वर्गमभिवाञ्छामि द्वेष्मि वापि न रौरवम् ॥ २९ ॥
आत्मन्येव हि तिष्ठामि मन्दराद्रिरिवाभ्रमः ।
कणशः कीर्णत्रिजगत्क्षीरसागरसंसृतिः ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
मैं न स्वर्ग की अभिलाषा करता हूँ और न रोरव नरक के साथ द्वेष
ही करता हूँ, किंतु मन्दराचल की नाई भ्रमशून्य होकर अपनी आत्मा में ही स्थित हूँ