Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 43, Verse 9
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 43, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
दृष्ट्यानया रघुपते सङ्गमुक्तेन चेतसा ।
संसारविरलारण्ये विहरास्मिन्न खिद्यसे ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
वह सावधानता विषयासंग का त्याग करने पर ही प्राप्त होती है, यह बतला रहे महाराज वसिष्ठजी
उक्त आत्मार्चन में दृष्ट-फलों की बहुलता बतलाकर श्रीरामजी को उसमें प्रवृत्त कराते है ।
हे रघुपते, इस दृष्टि का अवलम्बन कर आसक्ति निर्मुक्त हुए चित्त से इस संसाररूपी विरल जंगल
में विहार कीजिए, ऐसा करने पर आप खिन्न नहीं रह सकते