Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 43, Verse 8
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 43, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
ग्राह्यग्राहकसंबन्धे सामान्ये सर्वदेहिनाम् ।
योगिनः सावधानत्वं यत्तदर्चनमात्मनः ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
तब तो अज्ञानियों को भी उक्त प्रकार का शिवार्चन सदा ही हो जाया करता है ? इस पर कहते हैं।
आयुष्मन्, सभी देहधारियों में यद्यपि ग्राह्म-ग्राहकसम्बन्ध साधारण ही है; तथापि योगियों की जो
सावधानता है, वही आत्मा का अर्चन है । निष्कर्षं यह निकला कि हमारी सावधानता ही अज्ञानियों की
अपेक्षा हममे विशेष है