Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 43, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 43, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
ततः प्रभृति तेनैव क्रमेणार्चनमात्मनः ।
अद्य यावद्गतव्यग्रः कुर्वन्नहमवस्थितः ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार स्वाभाविक ही विकल्परूप अध्यारोप में पूजनरूपता का चिन्तन मैं तभी से लेकर आज
तक करता हुआ ही स्थित हूँ, ऐसा कहते हैं।
हे श्रीरामजी, तबसे लेकर आज तक उसी क्रम से मैं व्यग्रता छोड़कर आत्मा का अर्चन करता हुआ
अवस्थित रहता हूँ