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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 43, Verses 31–32

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 43, verses 31–32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 31,32

संस्कृत श्लोक

विश्रान्तश्चिरसंभ्रान्तो निर्भ्रमो राम मन्दरः । अवस्त्विदमिदं वस्तु पश्येति कलनास्त्यलम् ॥ ३१ ॥ हृदि तस्य कुसंदेहजालेन ज्वलिताधिकम् । इदमित्थं जगदिति ज्ञातं येन मुनीश्वर ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

परमाणु की नाई कण-कण बनाकर तीनों लोकँ को नष्ट कर देनेवाले क्षीर-सागर की चारों ओर जो व्याप्ति है, उस व्याप्ति के सदृश व्याप्तिवाला यह रामरूप मन्दराचल जो चिरकाल से भ्रम में पड़ा था अब भ्रमशून्य होकर विश्रान्त हो गया है ॥ ३ ०॥ यह जगत्‌ जिस स्वरूप का दिखाई देता है, उसी स्वरूप का है, उससे भिन्न उसका कोई दूसरा स्वरूप नहीं है यों जो मूर्ख जानता है, उसके हृदय में ज्वाला के सदुश अधिक सन्तापदायी, कुत्सित संशय-समूहों से होनेवाली "यह वस्तु है ओर यह अवस्तु है” इस प्रकार की कल्पनाएँ पर्याप्तरूप से उदित होती रहती हैँ । हे मुनीश्वर, मेरे द्वारा कहे गये इस अर्थ को आप अपने अनुभव से भी प्रमाणित कीजिए ओर देखिए । उस प्रकार का मूढ पुरुष जिन धन आदि विषयों के लिए कार्पण्य करता हे, जगत्‌-सम्बन्धी वे वस्तुएँ तात्तविक विचार से हम लोगों को प्राप्त ही नहीं होतीं