Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 35
चौंतीसवाँ सर्ग समाप्त (&) प्रलयकालीन समुद्र के समान द्वैत के साथ एेक्य का अभाव होने पर भी स्वात्मा में संक्षोभ होगा, इस पर “नहीं” ऐसा कहते हैं - ^असंक्षोभात्^ संक्षोभ क्यों नहीं होगा ? इस पर कहते हैं - “घनचेतनया” ।
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- Verse 1सैंधव-खण्ड के घनीभूत होने पर भी उसके रस में द्रवत्व आदि विकार जैसे देखा जाता है, वैसे ही…
- Verse 2भद्र, जैसे मेघसंपुट से यानी मेघों के बीच से अथवा आकाश और पृथिवी के बीच से उदित हुआ किरणों…
- Verse 3तत्त्वबोध में उपयोगी होने के कारण भगवान् पहले उपाय और उपेय रूप सार बतलाते हैं। ईश्वर ने…
- Verse 4त्वमर्थ में भी द्रष्टव्य, हेय ओर उपादेय बहुत है, फिर उसका आदर क्यो न किया जाय ? इस पर कहत…
- Verse 5स्वीकृत इष्ट ओर परिहत अनिष्ट विषय जब चित्त के आश्वासन में हेतु होते हैं, तब वे शान्तिमय ह…
- Verse 6अथवा धीर-तलवार बनने में यदि तुम असमर्थ हो, तो उसकी प्राप्ति के लिए पुनः कुछ काल तक श्रवण…
- Verse 7बाह्माकार दर्शनों के मध्य में वेहात्मतादर्शन ही महान् अनर्थ और सम्पूर्ण अनर्थो का बीज है…
- Verse 8प्राण-वायु से शून्य हुआ देहरूपी घर संचलन छोडकर मूक के सदृश स्थित रहता हे । देहरूपी घर में…
- Verse 9उनमें क्रियाशक्ति का मूल ओर आश्रय दोनों नष्ट हो जाते हैं, परन्तु चितिशक्ति नष्ट नहीं होती…
- Verse 10आकाश से भी स्वच्छ चिदात्मा नष्ट नहीं होता (इसलिए अनेक प्रकार के) भ्रमों से क्या होगा ? (च…
- Verses 11–12स्थूलदेहमात्र मे तो मलिनता होने से विति को अभिव्यक्त करने की सामर्थ्य नहीं है, इसका दृष्ट…
- Verse 13होने के कारण उनकी वृत्ति द्वारा उन दोनों में यानी बाह्य क्रियाओं में और अपना स्वरूप जानने…
- Verse 14चिति की अभिव्यक्ति में उत्कर्ष के कारण ही हरि, हर आदि देवताओं में भी उत्कृष्ट देवरूपता है…
- Verse 15वही सर्वत्र व्यापक आत्मा है, सर्वचैतन्याकार चेतन है, देवेश देवभृत्, धाता, देवदेव और स्वर…
- Verse 16महाचैतन्य के जगदात्मक समुल्लास की ओर जो मुग्ध नहीं होते, ऐसे जो भी कोई हैं, वे ब्रह्मा, व…
- Verse 17जो पख्रह्मरूप देवता है, उसकी दृष्टि मे तत्-तत् गुण मे अभिमान रखनेवाले, ये ब्रह्मा आदि स…
- Verses 18–19यह जो कहा गया है, वह अशास्त्रीय व्यवहारद्गष्टि से कहा गया है, शास्त्रीय दृष्टि से नहीं। व…
- Verse 20अनन्त होने के कारण अविद्या के विलासो का वर्णन नहीं किया जा सकता, इस आशय से कहते है । इसीस…
- Verse 21चूँकि ब्रह्मा, हरि, हर आदि देवताओं का भी देहरूप उपाधि का परिग्रह आविद्यक ही हे, इसलिए यह…
- Verse 22हे मुने, जिसने उक्त चैतन्यात्मक महादेव- तततव का परिचय कर लिया है, उसके लिए तो वही तत्त्व…
- Verse 23तत्त्वज्ञानी को प्रत्येक इन्द्रिय और प्रत्येक वस्तु में प्रकाशरूप होने के कारण वही विषय ह…
- Verse 24समीप मे बैठाने के लिए आह्वान और प्रकाशन के लिए मन्त्र आदि कुछ भी उसके लिए उपयुक्त नहीं हो…
- Verse 25हे मुने, यह शिवात्मक चिति जिस- जिस वस्तुस्थिति की ओर जाती है, वहीं पर विषय, विषयप्रकाश, व…
- Verse 26महर्षे, इन्हीं सब कारणों से समस्त पूजा आदि व्यवहारो में प्रथमोपस्थित पूजायोग्य, नमस्कारयो…
- Verse 27वार्द्धक्य, शोक एवं भय के विनाशक इस आत्मतत्व का साक्षात्कार कर मनुष्य फिर संसार में भूजे…
- Verse 28हे विप्रेन्द्र, जो विदित हुआ समस्त जन्तुओं में अभय देता है, जो सबकी अपेक्षा आद्य है ओर जो…