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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 35, Verse 5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 35, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

शान्त्यशान्तिमयानेतान्विकल्पान्दलयन्नसिः । धीरोसिनान्यथाऽऽस्थित्वा त्वमेव भव चात्मदृक् ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

स्वीकृत इष्ट ओर परिहत अनिष्ट विषय जब चित्त के आश्वासन में हेतु होते हैं, तब वे शान्तिमय हो जाते हैं ओर जब विक्षेप के हेतु हो जाते हैं, तब वे ही अशान्तिमय हो जाते हैँ । शान्तिमय और अशान्तिमय इन विकल्पों का यदि दलन करते हो, तो तुम धीर ओर तलवाररूप हो । यदि वैसा नहीं करते तो तुम धीर नहीं हो इसलिए आस्था रखकर तुम आत्मदृक्‌ ओर धीर बन जाओ (दृश्य आकारो का स्पर्श न करनेवाली चिदात्मस्वभाव से अवस्थिति ही मुख्य स्थिति है, यह भाव है ।)