Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 35, Verses 18–19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 35, verses 18–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 18,19
संस्कृत श्लोक
कणास्तप्तायस इव वारिधेरिव बिन्दवः ।
तेष्विव भ्रमभूतेषु जातेष्विव परात्पदात् ॥ १८ ॥
स्थितेषु भ्रमबीजेषु कल्पनाजालकर्तृषु ।
सहस्रशतशाखेयमविद्योदेति पीवरी ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
यह जो कहा गया है, वह अशास्त्रीय व्यवहारद्गष्टि से कहा गया है, शास्त्रीय दृष्टि से नहीं। विचार
से (शास्त्रीय दृष्टि से) तो ब्रह्मा आदि के आविर्भाव से लेकर सर्ग आदि की चेष्टा, अनुग्रहपूर्वक उपदेश
देना, ब्रह्माण्डों का आधिपत्य स्वीकार करना आदि जितने तिरोभावपर्यन्त व्यवहार हैं, वे सब अविद्याकृत
भ्रान्तिस्वरूप ही हैं, वास्तविक नहीं, यह कहते हैं।
यथार्थ में परमपदरूप ब्रह्म से उत्पन्न नहीं हैं, तथापि अज्ञानवश परमपदस्वरूप ब्रह्म से उत्पन्न
की तरह प्रतीयमान, एकमात्र भ्रमस्वरूप उन पदार्थों की तथा भ्रमो मे हेतुभूत उन्हीं अनेक कल्पनाओं
के करनेवाले मन की स्थितिदशा में ही हजारो शाखा-प्रशाखाओं में फैलकर वेद, वेदार्थ सृष्टि के
आदिम क्रम, सांगोपांग क्रियाकला, उपासनाएँ एवं ब्रह्मत्व के बोधोपयोगी उपाय ओर वेद आदि में
अधिकारी जीव तथा उनकी काम, कर्म ओर वासना, जन्म, मरण आदि अनर्थरूप जटा इन सबकी
स्वरूपभूत यह अविद्या उत्तरोत्तर स्थूलतम होकर स्फुरित होती है