Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 35, Verse 13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 35, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
सर्वगापि चिदुच्छूनबोधात्स्पन्दादिकं प्रति ।
बोधात्कलङ्कविमला चिदेव परमं शिवम् ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
होने के कारण उनकी वृत्ति द्वारा उन दोनों में यानी बाह्य क्रियाओं में और अपना स्वरूप जानने में समर्थ
होती है, यह कहते हैं।
सर्वव्यापक होती हुई भी चिति बाह्य घटादि-आकार से स्थूल हुई बुद्धिवृत्ति से देहस्पन्दन आदि के
प्रति समर्थ होती है । ओर ब्रह्माकारज्ञान से तो मायाकलंक से निर्मुक्त होकर वह परमशिव यानी
कैवल्यनामक परमकल्याणस्वरूप हो जाती है । अभिव्यक्त हुई वह चिति ही सम्पूर्ण पदार्थो की सत्तारूप
स्फूर्तिं का प्रदान करनेवाली है ओर वही देवतास्वरूप है