Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 35, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 35, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
चिदात्मा खादपि स्वच्छो न विनश्यति किं भ्रमैः ।
मनःप्राणमये देहे चित्तत्त्वं परिजायते ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
आकाश से भी स्वच्छ
चिदात्मा नष्ट नहीं होता (इसलिए अनेक प्रकार के) भ्रमों से क्या होगा ? (चिदात्मा क्यो नष्ट नहीं
होता 2 इसमें उपपत्ति कहते है ।) क्योकि लिंगदेह से संवलित मनःप्राणमय देह मे आवरणरहित
चितितत्त्व की ही अभिव्यक्ति होती है