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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 35, Verse 7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 35, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

इत्युक्त्वा बाह्यबोधस्त्वं मा भवेति त्रिशूलधृक् । प्राणेनेदं देहगेहं परिस्फुरति यन्त्रवत् ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

बाह्माकार दर्शनों के मध्य में वेहात्मतादर्शन ही महान्‌ अनर्थ और सम्पूर्ण अनर्थो का बीज है, अतः उसे ही मुझसे छुडाने के लिए भगवान्‌ प्रवृत्त हए, यों महाराज वस्रिष्ठजी कहते हैं। त्रिशूलधारी भगवान्‌ शंकर ने उस तरह का दूसरा कल्प कहकर आगे कहे जानेवाले देहात्मभ्रम के निरास के लिए फिर यह कहा कि तुम बाह्यदेह आदि में आत्मज्ञानी मत बनो | (देह की क्रियाशक्ति जैसे पराधीन है, वैसे ही चेतनशक्ति भी पराधीन है । इसलिए देह में आत्मा की प्रसक्ति नहीं हो सकती, इस अभिप्राय से प्राण के अधीन देह की चेष्टा है, यह कहते हैं ।) यन्त्र की नाई प्राण से ही यह देहरूपी घर स्फुरित होता है