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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 35, Verse 3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 35, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

ईश्वर उवाच । मुने मननमाहूय स्वसत्तैवाशु मीयताम् । त्वमर्थं माहरानर्थं पवनः स्पन्दतामिव ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

तत्त्वबोध में उपयोगी होने के कारण भगवान्‌ पहले उपाय और उपेय रूप सार बतलाते हैं। ईश्वर ने कहा : हे मुने, तुम पहले विचार को सन्निधि में लाकर अपने (प्रत्यगात्मा के) पारमार्थिक स्वरूप का ही प्रमाणो से शीघ्र निर्धारण करो । उक्त प्रत्यगात्मा में अनर्थभूत (बहिर्मुखता के आपादन द्वारा सम्पूर्ण अनर्थो के मूलभूत) त्वमर्थं का यानी युष्मत्‌-प्रत्यय के योग्य अचिदंश का ग्रहण मत करो, क्योंकि जैसे स्पन्दनशक्ति का नयन कर रहा पवन अचल ही आकाश को ताप, रज, जडता आदि से युक्त बनाता हे, वैसे ही यह त्वमर्थं भी आत्मा को जडता आदि अनर्थो से युक्त बनाता हे