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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 35, Verse 4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 35, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

द्रष्टव्यमिह यत्किंचित्तद्दृष्टं किं समं भ्रमैः । न हि हेयमुपादेयं चेह पश्यामि तद्विदः ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

त्वमर्थ में भी द्रष्टव्य, हेय ओर उपादेय बहुत है, फिर उसका आदर क्यो न किया जाय ? इस पर कहते हैं। जो कुछ इस संसार में दर्शन योग्य है, उसे तत्त्वज्ञानी ने देख लिया; क्योकि येनाश्रुतं श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातं भवति" (जिसका ज्ञान हो जाने पर अश्रुत श्रुत, अविचारित विचारित ओर न जाना गया जाना गया होता हे) इत्यादि श्रुति के अनुसार आत्मदर्शन द्वारा ही सम्पूर्ण द्रष्टव्य पदार्थो का तत्त्वतः दर्शन हो ही जाता है । अतः उसे (तत्त्वज्ञ को) देखे गये या न देखे गये भ्रमो के साथ प्रयोजन ही क्या रहा ? भ्रम-विषयों में तत्त्वज्ञानी के लिए कोई हेय या उपादेय नहीं रहता, यह मैं ठीक जानता हूँ