Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 35, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 35, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
ये नाम ते जगत्येते ब्रह्मविष्णुहरादयः ।
परस्मात्परिनिर्याता ब्रह्मविष्णुहरादयः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
जो पख्रह्मरूप देवता है, उसकी दृष्टि मे तत्-तत् गुण मे अभिमान रखनेवाले, ये ब्रह्मा आदि
सृष्टि आदि कार्य के लिए आविर्भूत हुए हैं और अग्नि के विस्फुलिंग की नाई लक्षित होते हैं, इस आशय
से कहते हैं।
भद्र, परम चिति से चारों ओर से निकले हुए ये ब्रह्मा, विष्णु, महादेव आदि तपे हुए लाल-लाल
लोहे के गोले से निकले अग्नि-कणों की नाई और समुद्र से निकले जलबिन्दुओं की नाई परमचैतन्य के
ही एक अंशरूप हैं