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Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 101

सौरवाँ सर्ग समाप्त एक सौ एकवा सर्ग ज्ञान की दृढता से राजा शिखिध्वज की कृतकृत्यता, जीवन्मुक्ति में अचित्तता तथा तत्त्व की स्थिति का वर्णन |

26 verse-groups

  1. Verses 1–7महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, इस तरह अकृत्रिम कुम्भ के उस कथन का विचार कर…
  2. Verses 8–9“सदा एकरूप“ इस विशेषण से अन्य विकारों का खण्डन किया गया है, यह समझ लेना चाहिए । सामान्यरू…
  3. Verses 10–17चित्तगत कषायों का (वासनाओं का) परिपाक न होने से पहले आप ज्ञान प्राप्त न कर सके, इस समय तो…
  4. Verses 18–23आपका अज्ञान आज ही मध्याहकाल में क्षीण हुआ है, यह मुझे अच्छी तरह मालूम है, यह कहते हैं । ह…
  5. Verses 24–29चित्त का परित्याग हो जाने पर जीवन्मुक्त पुरुषों को किस अन्तःकरण से व्यवहार की सिद्धि होती…
  6. Verses 30–32जीवन्मुक्तो के व्यवहाराभास में वही कारणाभास है, यह कहते हैँ । जितेन्द्रिय जीवन्मुक्त महात…
  7. Verses 33–35आपका भी सत्व के बल से ही जीवनपर्यन्त व्यवहार चलता रहेगा, इस आशय से कहते है। हे महीपते, मह…
  8. Verse 36चित्त के परित्याग में तप, दान, आदि सम्पूर्ण कर्म अन्तर्भूत हैँ ओर उसके फल में धन, स्वर्ग,…
  9. Verses 37–38तप आदि के फल में ज्ञान के फल का अन्तभाव नहीं हो सकता, इस आशय से कहते हैं। हे भूपते, तप कि…
  10. Verse 39असत्य और अनित्य वस्तु में सत्य और नित्य वस्तु के अन्तर्भाव की संभावना भी नहीं है। ज्ञान क…
  11. Verse 40ज्ञान की प्राप्ति दुर्लभ होने से अज्ञानियो को तुच्छ स्वगदि फल के लिए यत्न करना ठीक ही है,…
  12. Verse 41फिर आप क्यों इस कृच्छचान्द्रायण आदि तपःक्लेशप्रचुर अनर्थ में अभी तक निमग्न हैं, जो कि वान…
  13. Verse 42स्वगदि महासुख की हेतु तपस्या अनर्थरूप कैसे है, इस पर कहते हैं। हे सुमते, इस तपस्या का आदि…
  14. Verses 43–45ज्ञान के फल चिदाकाश का लाभ होने से सभी का लाभ हो गया, क्योकि सम्पूर्ण जगत्‌ की एक उसीसे उ…
  15. Verse 46आत्मातिरिक्त इच्छित पदार्थो मे पुरुषार्थता स्वीकार कर, लब्ध होने के कारण ही, वे अप्रार्थन…
  16. Verse 47ज्ञानप्राप्ति के अनन्तर स्वगदि- साधनो के समान अपवर्ग के साधन भी हेय ही हो जाते हैं, इस आश…
  17. Verse 48चित्त की चंचलता के बिना समस्त पदार्थों में सद्‌ू-अंश का सतत्वरूप से ओर असद्‌-अंश का नित्य…
  18. Verses 49–53-अस्पन्दितचित्तमूः“ इस कथन का प्रयोजन बतलाते है । क्योकि अपरिस्पन्दित चित्तवाले पुरुष को…
  19. Verses 54–55स्पन्द ओर अस्पन्द विरुद्ध धर्मवाले इन दोनो को एकत्र कैसे किया जा सकता है, यह राजा शिखिध्व…
  20. Verse 56स्पन्द ओर अस्पन्द में एकता का उपपादन करते है । इस सृष्टि में जो सर्वस्व है वह चिति का स्प…
  21. Verse 57ठीक है, ऐसा ही सही । फिर भी स्पन्द और स्पन्दशून्य में एकता कैसे, इस पर कहते है । यदि तत्‌…
  22. Verse 58तव सृष्टि कहाँ जायेगी, इस पर कहते हैँ । यह सर्ग चिति का स्पन्दमात्रस्वरूप है । चूँकि यह अ…
  23. Verse 59स्पन्दनयुक्त चिति सर्गनाम से कही जाती है ओर स्पन्दनशून्य चिति तो तुर्यातीतपद में आरूढ है…
  24. Verse 60वह कब उदित होती है, उसे कहते है। शास्त्रों के निरन्तर अभ्यास के योग से तथा सज्जन पुरुषों…
  25. Verse 61यदि आप इस चिति का वाणी से कथन करने मे समर्थ नहीं है तो फिर आप मेरे सदश लोगों से कहते ही क…
  26. Verse 62आप भी स्वानुभूति की प्राप्ति कर चुके हैं, इसलिए मेरे वचन से केवल उसे स्थिर कर लीजिये, यह…