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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 101, Verses 37–38

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 101, verses 37–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

तपो नाम कियन्मात्रदुःखक्षयकरं भवेत् । क्षयातिशयनिर्मुक्तं यत्सुखं समतामयम् ॥ ३७ ॥ तत्सत्तद्वस्तु तत्किंचिन्न तु स्वर्गादि भङ्गुरम् । भावाभावैरुपारूढं स्थिताधिगतवेदनम् ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

तप आदि के फल में ज्ञान के फल का अन्तभाव नहीं हो सकता, इस आशय से कहते हैं। हे भूपते, तप कितने दुःखों का नाश कर सकता है, क्योंकि चित्तत्यागरूप समता से प्राप्त जो ज्ञान का फल मोक्षसुख है वह क्षय से अतिशय निर्मुक्त है यानी उसमें क्षय का अत्यन्त अभाव है