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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 101, Verse 57

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 101, verse 57 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 57

संस्कृत श्लोक

चितः स एव चेत्स्पन्दस्तथाऽस्पन्दश्च भावितः । एकरूपतया नाम तत्रेदममलं शिवम् ॥ ५७ ॥

हिन्दी अर्थ

ठीक है, ऐसा ही सही । फिर भी स्पन्द और स्पन्दशून्य में एकता कैसे, इस पर कहते है । यदि तत्‌-तत्‌ साक्ष्यात्मा ही चिति का स्पन्द ओर अस्पन्द है तथा एकरूप से भावित है तो ऐसी स्थिति में वहाँ केवल यह निर्मल आत्मस्वरूप शिव ही अवशेष रहता हे