Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 101, Verse 39
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 101, verse 39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
स्वर्गो नाम किमानन्दः सोपि संदेहसंस्थितः ।
अप्राप्तस्वात्मसंसिद्धेः क्रियाकाण्डः शुभो भवेत् ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
असत्य और अनित्य वस्तु में सत्य और नित्य वस्तु के अन्तर्भाव की संभावना भी नहीं है।
ज्ञान का फल सत्य और शाश्वत है। जो कुछ थोड़ा-बहुत स्वर्गादि फल है वह तो सत्य है ही नहीं,
वह क्षणभंगुर है वह आविर्भाव ओर तिरोभाव से - उत्पत्ति और विनाश से - आक्रान्त होने के कारण
भूत ओर भविष्यत् काल में अनुभूत नहीं होता, केवल वर्तमानकाल में अवस्थित हुआ ही स्वप्नवत्
अनुभूत होता है ॥३ ८॥
तुच्छ और अत्यन्त परिश्रम से प्राप्त होनेवाला स्वर्गादि सुख है, वह अज्ञानियों को बड़ा लगता है।
वह तत्त्वविदों को नहीं, इस आशय से कहते हैं।
हे महीपते, स्वर्गनाम का कौन-सा सुख है ? वह भी तो हजारों अवर्जनीय धर्मकीर्तन आदि अपराधों
द्वारा सन्देह से ही स्थित है जिस पुरुष को आत्मज्ञान की सिद्धि प्राप्त नहीं है उसीको क्रियाकाण्ड
शुभफल प्रदान करनेवाला होता है