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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 101, Verses 33–35

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 101, verses 33–35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 33-35

संस्कृत श्लोक

सत्ववानसि संजातो महात्यागी स्थितो भवान् । अशेषेण त्वया चित्तं त्यक्तमद्येति वेद्म्यहम् ॥ ३३ ॥ समस्तवासनोन्मुक्तो राजन्नद्यैव राजसे । आकाशसाम्यमायातं मन्ये तव मुने मनः ॥ ३४ ॥ शमं प्राप्तोऽसि परमं सिद्धः समसमस्थितिः । अयं हि स महात्यागः सर्वं यत्तत्समुज्झितम् ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

आपका भी सत्व के बल से ही जीवनपर्यन्त व्यवहार चलता रहेगा, इस आशय से कहते है। हे महीपते, महात्यागी बनकर आप सत्त्वसम्पन्न हो चुके हैँ । आज आपने पूर्णरूप से अपने चित्त का परित्याग कर दिया, यह मेँ जानता हूँ। हे राजन्‌, आज ही तो आप सम्पूर्णं वासनाओं से निर्मुक्त होकर सुशोभित हो रहे हैं हे मुने, अब आपका मन आकाश के समान स्वच्छ हो गया, यह मैं मानता हूँ । हे राजन्‌, आप परम शम को प्राप्त हो चुके हें । आप सिद्ध होकर सम से भी सम स्थिति में पहुँच गये हैँ । जो महात्याग आपको पहले वांछित था वह यही है कि सर्वस्वरूप उस चित्त का आपने परित्याग कर दिया