Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 101, Verses 10–17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 101, verses 10–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 10-17
संस्कृत श्लोक
कुम्भ उवाच ।
मनस्युपशमं याते त्यक्तभोगैषणे स्थिते ।
कषायपाके निर्वृत्ते सर्वेन्द्रियगणस्य च ॥ १० ॥
यान्ति चेतसि विश्रान्तिं विमला देशिकोक्तयः ।
यथा सितांशुके शुद्धे बिन्दवः कुङ्कुमाम्भसः ॥ ११ ॥
कषायाणामनन्तानां संभृतानां शरीरकैः ।
स्ववासनास्वरूपाणामद्य पाकस्तवोदितः ॥ १२ ॥
देहान्मलानि सर्वाणि कालेन कमलेक्षण ।
साधो वृक्षात्फलानीव पाकेन विगलन्त्यधः ॥ १३ ॥
वासनात्मसु यातेषु मलेषु विमलं सखे ।
यद्वक्ति गुरुरन्तस्तद्विशतीषुर्यथा विसे ॥ १४ ॥
कषायपाके संपन्ने त्वं मयाद्य विबोधितः ।
तेनाद्यैव तवाज्ञानक्षयो जातो महामते ॥ १५ ॥
अद्य पक्वकषायस्त्वमद्यैव ज्ञानसंकथाम् ।
अद्येह सोपदेशस्त्वमद्यैवासि प्रबुद्धवान् ॥ १६ ॥
शुभाशुभानां सर्वेषां कर्मणामद्य संक्षयः ।
सत्सङ्गव्यपदेशेन तव निष्पत्तिमागतः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
चित्तगत कषायों का (वासनाओं का) परिपाक न होने से पहले आप ज्ञान प्राप्त न कर सके,
इस समय तो तपस्या के द्वारा उनका परिपाक हो जाने से आपने प्राप्त कर लिया, इस आशय से
कुम्भ उत्तर देते हैं ।
कुम्भ ने कहा : हे राजन्, भोग की इच्छाओं का त्याग कर चुके मन के उपशान्त होकर अवस्थित
हो जाने पर सम्पूर्ण इन्द्रियो ओर मन के भोगरूप कषायों का पाक सम्पन्न हो जाने से चित्त में
उपदेश की विमल उक्तियाँ उस तरह स्थिति को प्राप्त होती हैं, जिस तरह सफेद शुद्ध वस्त्र के ऊपर
कुंकुम जल के बिन्दु (७) | हे राजन्, आपके अनन्त स्ववासनास्वरूप कषायों का, जो अनेक जन्म
के शरीरों द्वारा एकत्र किये गये थे, आज परिपाक उदित हुआ है । हे कमललोचन साधो, काल से
पककर लिंग देह से सम्पूर्ण मल (%) उस तरह गिर जाते हैं, जिस तरह काल से पककर वृक्षों से
उनके फल नीचे गिर जाते हैं। हे मित्र, वासनात्मक मलों के शरीर से दूर चले जाने पर गुरु जो विमल
उपदेश देते हैँ, वह अन्तःकरण में उस तरह शीघ्र प्रविष्ट हो जाता है, जिस तरह कमल के दंड रूप
लक्ष्य में बाण । हे महामते, कषायो का पाक सम्पन्न हो जानेपर आज आप मेरे द्वारा विबोधित हुए
हैं, इसलिए आज ही आपके अज्ञान का सर्वथा नाश हुआ । आज आपके कषायो का खूब परिपाक
हो गया । आज ही आपने ज्ञानार्थं उपदेश का तात्पर्यरूप से अवधारण किया हे । उपदिष्ट अर्थो का
अपने हृदय में धारण करने से आप इस समय इस संसार में उपदेश से समन्वित हो गये । उपदेश-
फलस्वरूप साक्षात्कार ज्ञानवान् भी अभी आप हुए हैँ । हे राजन्, सत्संग के बहाने आज आपके शुभ
ओर अशुभ सब तरह के कर्मो का बिलकुल क्षय सम्पन्न हो गया