Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 101, Verse 40
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 101, verse 40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
येन नासादितं हेम रीतिं किं स परित्यजेत् ।
चूडालादिसमासङ्गाद्भवेज्ज्ञत्वं सुखेन ते ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
ज्ञान की प्राप्ति दुर्लभ होने से अज्ञानियो को तुच्छ स्वगदि फल के लिए यत्न करना ठीक ही है, इस
अभिप्राय से कहते हैं।
हे राजन्, जिसने सुवर्ण की प्राप्ति नहीं की वह क्या पित्तल छोड़ देगा (आपको तो पहले ज्ञान
दुर्लभ नहीं था, तथापि आप व्यर्थ ही तपरूपी क्लेश में फस गये, यह कहते हैं ।) आपको तो चूडाला
आदि की सत्संगति से सुखपूर्वक ज्ञान मिल सकता था