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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 101, Verses 24–29

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 101, verses 24–29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 24-29

संस्कृत श्लोक

शिखिध्वज उवाच । एवं हि भगवन् जन्तोर्मूर्खस्यैवास्ति चित्तभूः । प्रबुद्धस्य न तज्ज्ञस्य चित्तं नाम किल प्रभो ॥ २४ ॥ जीवन्मुक्तास्तदेते हि विहरन्ति कथं वद । अविद्यमानमनसो युष्मदाद्यास्तथा नराः ॥ २५ ॥ इति मे कथयाशेषमन्यैः स्ववचनांशुभिः । हार्दं तमो मे निपुणमेवंप्रायैः प्रमार्जय ॥ २६ ॥ कुम्भ उवाच । यथा वदसि तत्त्वज्ञ तत्तथैव हि नान्यथा । चित्तं हि जीवन्मुक्तानां नास्त्यङ्कुर इवाश्मनाम् ॥ २७ ॥ पुनर्जननयोग्या या वासना घनवासना । सा प्रोक्ता चित्तशब्देन न सा तज्ज्ञस्य विद्यते ॥ २८ ॥ यया वासनया तज्ज्ञा विहरन्तीह कर्मसु । तां त्वं सत्त्वाभिधां विद्धि पुनर्जननवर्जिताम् ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

चित्त का परित्याग हो जाने पर जीवन्मुक्त पुरुषों को किस अन्तःकरण से व्यवहार की सिद्धि होती है, यह पूछने के लिए राजा भूमिका बोधिते है । राजा शिखिध्वज ने कहा : मुनिवर, यों आपके कहने के अनुसार मूर्खं जन्तु के लिए ही चित्त की भूमि है, प्रबुद्ध हुए के लिए नहीं । हे प्रभो, यदि आत्मज्ञानी के लिए चित्त नहीं है तो कृपाकर बतलाइये कि ये अविद्यमान मनवाले जीवन्मुक्त-आपसे लेकर ओर दूसरे पुरुष-इस संसार में केसे विहार करते हैं तथा हे मुनीश्वर, आप मुझे अच्छी तरह समझाकर इसको पूर्णं रीति से कहिए ओर इस तरह की दूसरी यानी सूर्य आदि की किरणों से विलक्षण अपनी वचनरूपी किरणों से मेरे हृदय के अन्धकार को, जो प्रसिद्ध अन्धकार से विलक्षण है, भलीर्भोति दूर कर दीजिये । कुम्भ ने कहा : हे तत्त्वज्ञ, जैसा आप कह रहे हैं, ठीक वह वैसा ही है उससे विपरीत तनिक भी नहीं है । जिस तरह पत्थर में अंकुर नहीं रहता वैसे ही जीवन्मुक्तो में चित्त नहीं रहता । पुनः उत्पन्न होने योग्य जो घनवासना रहती है वह चित्तशब्द से कही जाती है, वह आत्मज्ञानी में नहीं रहती । हे राजन्‌, जिस वासना से तत्त्वज्ञानी यहाँ कर्मो में विहार करते हैं, पुनर्जन्म से रहित उसे आप सत््वनामधारिणी जानिये । तात्पर्य यह है कि जैसे भूना हुआ तथा छिलकारहित धान धानशब्द से नहीं कहा जाता और वह अंकुर पैदा करने में समर्थ भी नहीं रहता वैसे ही तत्त्वज्ञान से भूना गया आवरण शून्य सत्त्व मनशब्द से नहीं कहा जाता और न वह पुनर्जन्म के समर्थ ही रहता हे