Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 101, Verse 58
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 101, verse 58 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 58
संस्कृत श्लोक
सर्गश्चित्स्पन्दमात्रात्मा सम्यग्दृष्टौ विलीयते ।
उदेत्यसम्यग्दृष्टीनां रज्ज्वां सर्पभ्रमो यथा ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
तव सृष्टि कहाँ जायेगी, इस पर कहते हैँ ।
यह सर्ग चिति का स्पन्दमात्रस्वरूप है । चूँकि यह असम्यक् दृष्टिवले पुरुषों को भ्रान्ति से, रज्जु में
सर्पभ्रम की नाई, उदित होता है, अतः सम्यग् दृष्टि से ही इसका विलय होता है