Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 101, Verses 54–55
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 101, verses 54–55 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 54,55
संस्कृत श्लोक
कुम्भ उवाच ।
एकं वस्तु जगत्सर्वं चिन्मात्रं वारिवाम्बुधि ।
तदेव स्पन्दते धीभिः शुद्धवारिव वीचिभिः ॥ ५४ ॥
ब्रह्म चिन्मात्रममलं सत्त्वमित्यादिनामकम् ।
यद्गीतं तदिदं मूढाः पश्यन्त्यङ्ग जगत्तया ॥ ५५ ॥
हिन्दी अर्थ
स्पन्द ओर अस्पन्द विरुद्ध धर्मवाले इन दोनो को एकत्र कैसे किया जा सकता है, यह राजा
शिखिध्वज पूछते हैं।
राजा शिखिध्वज ने कहा : हे सम्पूर्ण संशयों का विच्छेद करनेवाले विभो, आप कृपाकर मुझे शीघ्र
बतलाइये कि स्पन्द ओर अस्पन्द ये दोनों एेक्य को कैसे प्राप्त होते हैं ॥५ ३॥
इन दोनों में स्वरूपतः ऐक्य विरोध होनेपर भी अधिष्ठान साक्षिचिन्मात्ररूप से विरोध नहीं है, यों
अपना अभिप्राय प्रकाशित करते हुए कुम्भ ऋषि कहते हैं।
कुम्भ ऋषि ने कहा : जैसे सागर जलरूप से एक है वैसे ही यह सम्पूर्ण जगत् चिन्मात्रस्वरूप से एक
वस्तु है। जैसे शुद्ध जल ही तरंगों से स्पन्दित होता है वैसे ही वही अधिष्ठानचिन्मात्र बुद्धिवृत्तियों से
स्पन्दित होता है, अर्थात् स्पन्दस्वरूप से विवर्तित होता है। हे राजन्, “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" इत्यादि
श्रुतियों ने जिसे ब्रह्म, चिन्मात्र, अमल, सत्त्व इत्यादि नामों से कहा है उस ब्रह्म को ही मूढ लोग जगद्रूप
से देखते हैं