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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 101, Verse 46

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 101, verse 46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 46

संस्कृत श्लोक

स्त्रिया तथैव स कथं दयितः प्रार्थ्यते स्वयम् । संकल्परचितानेतान्भावानापतभासुरान् ॥ ४६ ॥

हिन्दी अर्थ

आत्मातिरिक्त इच्छित पदार्थो मे पुरुषार्थता स्वीकार कर, लब्ध होने के कारण ही, वे अप्रार्थनीय हैं, यों बतलाया। वस्तुतस्तु तत्त्वज्ञानियों की दृष्टि मे तुच्छ होने के कारण वे अग्राह्य ही हैं, यह कहते हैं । हे मित्र, संकल्प से रचित हुए आपत्ति की नाई अरमणीय इन पदार्थो का आत्मज्ञानी महात्मा लोग, जल में प्रतिबिम्बित सूर्य के समान, ग्रहण नहीं करते