Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 101, Verse 56
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 101, verse 56 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 56
संस्कृत श्लोक
चित्स्पन्द एव सर्वस्वं सर्गे तस्माद्धि संसृतिः ।
परिस्पन्दो हि विन्ध्यादिशब्दस्पन्दसमं परम् ॥ ५६ ॥
हिन्दी अर्थ
स्पन्द ओर अस्पन्द में एकता का उपपादन करते है ।
इस सृष्टि में जो सर्वस्व है वह चिति का स्पन्द ही है, क्योकि उसीसे संसार उत्पन्न होता है । संसार
में विन्ध्यादिरूप जो परिस्पन्द है वह द्वितीय शब्दस्पन्द के समान हे । तात्पर्य यह कि वह केवल नाममात्र
का परिस्पन्द है ओर कुछ नहीं